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एम4पीन्यूज। 

30 जनवरी का ही वह दिन था जब देश को हमेशा सत्य, अहिंसा और शांति का पाठ पढ़ाने वाले महापुरुष राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को मृत्यु हिंसा के द्वारा प्राप्त हुई। 30 जनवरी, 1948 को भारत के राष्ट्रपिता की हत्या कर दी गई थी। आज के दिन बापू की पुण्यतिथि पर ‘शहीद दिवस’ मनाया जाता है और उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है।

बलिदान दिवस: महात्मा गांधी की आखिरी जनवरी, जाने उनके जीवन की ख़ास बातें
बलिदान दिवस: महात्मा गांधी की आखिरी जनवरी, जाने उनके जीवन की ख़ास बातें

अहिंसा के मार्ग पर चलकर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने सिर्फ भारत को करीब 200 साल से शासन कर रहे अंग्रेजों से आजादी दिलाई, बल्कि अपने प्राणों की आहुति भी दे दी। अहिंसा के मार्ग पर चलकर उन्होंने भारत को आजादी दिलाकर पूरी दुनिया में जनता के नागरिक अधिकारों एवं स्वतंत्रता के प्रति आंदोलन के लिए प्रेरित किया।

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विश्व के इतिहास में बहुत कम ऐसे व्यक्तित्व हुए जिन्होंने मानवता पर अपनी एक अलग छाप छोड़ी है इनमें से एक हैं महात्मा गांधी। उनका जीवन बड़ा ही सरल, सादा परंतु कठोर नियमों से बंधा हुआ था। उनका जीवन प्रयोगों की एक निरंतर कड़ी था। नैतिकता के प्रयोग का सबसे उत्कृष्ट उदाहरण ब्रिटिश दासता से भारत की आजादी पर उनके द्वारा किया गया नवीन एवं अनोखा प्रयोग है। अधिकांश धार्मिक एवं आध्यात्मिक ग्रंथों में जिस सत्य की बात कही गई है, गांधी जी ने उन्हीं सत्यों के साथ स्वयं को रूपांतरित, परिवर्धित व परिशोधित करने का कार्य किया।

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ब्रिटिश शासन द्वारा भारतीयों पर अत्याचार और उनकी दयनीय स्थिति का मुख्य कारण गांधी जी ने भारतीय समाज की नैतिक व आध्यात्मिक मूल्यों में कमी को माना और इससे छुटकारा प्राप्त करने हेतु आधुनिक सभ्यता की आलोचना, देशज संस्कृति व मूल्यों की उपयोगिता को मान्यता देना और ब्रिटिश सत्ता के मुकाबले के लिए नैतिक शक्ति के रूप में अहिंसात्मक तरीके से इस्तेमाल की बात कही।

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अत: नैतिक सम्पूर्णता ही सामाजिक प्रगति का सार है। जिस प्रकार से मानवीय समाज का अध्ययन किए बिना नीतिशास्त्र का ज्ञान अपर्याप्त है उसी तरह नीतिशास्त्र को सामाजिक दर्शन का एक स्वतंत्र भाग नहीं माना जा सकता। गांधी जी ने स्वयं कहा कि पूरी तरह से सैद्धांतिक नैतिक मानदंड जिनका कोई व्यावहारिक उद्देश्य नहीं है, महत्वहीन हैं और मेरा कोई भी कार्य जो आध्यात्मिकता का दावा करे परंतु अव्यावहारिक सिद्ध हो जाता है तो उसे असफल घोषित कर दिया जाना चाहिए। भेदभाव का मुकाबला करने के लिए गांधी जी के पास सत्य की शक्ति थी। उनकी पद्धति अहिंसक थी, दर्शन नैतिक था, सत्य और अहिंसा उनकी मजबूती।

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‘बापू’ के सत्य, अहिंसा के मार्ग को विश्व समुदाय युगों-युगों तक याद करने के साथ ही विषम परिस्थितियों में चिंतन करता है और करता रहेगा। महात्मा गांधी का जन्म 2 अक्तूबर 1869 को हुआ था। दुनियाभर में इस दिन को ‘अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।

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30 जनवरी 1948 की शाम को जब वह एक प्रार्थना सभा में भाग लेने जा रहे थे, तब एक युवा हिन्दू कट्टरपंथी नाथूराम गोडसे ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी। नाथूराम गोडसे की बंदूक से निकली तीन गोलियां बापू के शरीर को छलनी करती गईं। पहली गोली लगते ही बापू का कदम बढ़ाने को उठा पैर थम गया, लेकिन वे खड़े रहे।

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दूसरी गोली लगी और बापू का सफेद वस्त्र रक्तरंजित हो गया। उनके मुंह से शब्द निकला हे राम। तीसरी गोली चलते ही बापू का शरीर ढेर होकर धरती पर गिर गया, चश्मा निकल गया और पैर से चप्पल निकल गई। इन तीन गोलियों ने 200 वर्षों तक भारत को गुलामी की जंजीर में जकड़े रखने वाले अंग्रेजों को अहिंसक आंदोलन के जरिए झुका देने वाले महात्मा गांधी को हमेशा के लिए खामोश कर दिया।


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